Thursday, 21 June 2018

आड़

किसी बड़े पहाड़ की आड़ में चट्टान की ओट में बहते हुए झरने से खेलना जहाँ आपको कोई देख न रहा हो इस से ज्यादा सुकून किसी को क्या दे सकता है   ये ब्लॉग लिखना मेरे लिए ठीक वैसा ही है ,बड़े बड़े साहित्यकारों,कवियों,लेखकों से लद्पद इस संसार में एक जगह लिखना जहाँ मेरे लिखे हुए को पढने वाला कोई न हो अपने ही लिखे हुए साहित्य को खुद ही पढना समझना और आलोचना करना बहुत सुख देने वाला अनुभव है दरअसल में चाहता ही नहीं की मेरा लिखा हुआ कोई पढ़े और उसके अलग अलग अर्थ गढ़े मेरा लिखा हुआ मेरा सोचा हुआ मुझे समझ आ रहा है मुझे पता है की लिखते हुए में क्या लिखना चाहता था उसको कोई और शायद ही समझ पाए । में जानता हूँ की ये आड़ क्या है जिसमे में आज लिख रहा हूँ ये साहित्य का झरना जिसमे कुछ भी लिखकर लिखने का सुख अनुभव करता हूँ  ये मेरा अंजान ब्लॉग का एकान्त जिसपर किसी भी आलोचक की नजर नहीं है मेरा लिखा ही मेरे लिए साहित्य जगत की सबसे बड़ी उपलब्धि है,यहाँ बहुत सुकून है  ये सुकून लेने का वक्त है व्यर्थ में किसी शेक्सपियर या रवीन्द्रनाथ टेगोर जेसे बनने का सपना देखकर खुद को परेशान करने में क्या रखा है यहाँ में अपने साहित्य जगत का नोबेल खुद को देता हूँ और हर वर्ष का बुकर भी खुद को समर्पित करता हूँ ये मेरा ब्लॉग है में अपना लिखा पढ़कर खुश हूँ   बस 

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