बचपन मे जब भी प्रेमचंद की ईदगाह पढ़ता था तो इसे अपने यहाँ होने वाले गणगौर के साँचे में फिट करके देखता था। हालांकि हमारे मेले मे मैंने मिट्टी का भिश्ती कभी नहीं देखा। क्योकि मुंशी प्रेमचंद और हमारे बीच के पीढ़ियो के अंतराल ने खिलोनों का प्लास्टिककरण कर दिया था। ओर उन्ही खिलोनों का अब इलेक्ट्रोनिककरण भी हो गया है। चाबी से चलने वाले खिलौने हालांकि अब भी उपलब्ध है लेकिन सेल से चलने वाले उपकरण अब सुलभ हो गए है। स्प्रिंग के सहारे प्लास्टिक की स्टिक पर फुदक कर चलने वाले बंदर का रोमांच अब नहीं रहा और समाज मे बंदर का महत्व भी। काफी खोज अन्वेषण के बाद भी उस बंदर को न खोज पाने से निराश हुआ। दूध की रबड़ी अपने मूल स्वरूप मे मोजूद थी परन्तु अपेक्षाकृत सस्ती कोल्ड्ड्रिंक्स की एक बड़ी रेंज ने उसे लोगो के मुह से दूर ही बनाए रखा। इन सब के बीच न कुछ चीजे जैसे कचोरी,समोसा,दहि-बड़े अपने अस्तित्व को बचाने मे सफल भी रहे है बल्कि पाव-भाजी,आलू-टिकिया आदि कुछ शहरी खाद्य भी अपनी मोजूदगी दर्ज करा रहे है। स्मार्टफोंन और प्लेस्टेशन के युग मेँ बच्चे प्लास्टिक के खिलोनों को किस नजर से देखते होंगे नहीं मालूम। पर मेले मे जाने का जुनून अब भी कम नहीं हुआ है। मे सोचता हु की शायद भीड़ देखने के लिए ही लोग मेले मेँ जाते हैं इसलिए शहरों की प्रासंगिकता हमेशा से बनी हुई है। गलियों मे लोगों के हुजूम और सजे हुए बाजार को देखकर शहरी आभास होने लगता है और इसी आभास को महसूस करने के लिए लोग शायद मेले मे आते हैं। हर गाव अब शहर हो जाना चाहता है। पावभाजी और आलू-टिकिया इसी भावना की पुष्टि करते नजर आते हैं,अगली बार अगर चाउमीन और मोमोज भी नजर आ जाए तो हैरत नहीं। मेले के शोरगुल मे ठेले के पास माइक लिए खड़ी एक छोटी सी लड़की दस रुपए मे दो दहि-बड़ो का संदेश देती थक नहीं रही थी उसका यह कलाप पूरे मेले के दौरान जारी रहा। माइक हाथ मे होने का विजयी एहसास चेहरे पर साफ नजर आ रहा था,वह नरेंद्र मोदी से कम तो बिलकुल महसूस नहीं कर रही थी। मेले मे गाय का घुस आना और लोगों का तितर-बितर होना साधारण प्रक्रिया है और यह रूटीन मे घटित होती रहती है। महिलाओ की अगर बात करें तो मेलों मे महिलाओं की संख्या बहस का बिन्दु है और उनके आने का कारण शौध का विषय। फिर भी बक़ौल अनुभव मेलों मे महिलाओं की हिस्सेदारी अधिक रहती है। समय के साथ बदलाव निश्चित है और उम्र के साथ मेले मेँ जाने के कारण व रुचि के विषय भी बदलते रहते है। पीढ़ियों के साथ मेलों की विषयवस्तु बदली है और समाज की परिस्थितियाँ भी पर मुंशी प्रेमचंद की प्रासंगिकता अब भी कायम है। हो सकता है की इस समय भी कोई हामिद किसी ईदगाह के मेले मेँ अपनी माँ के लिए चिमटा खरीद रहा होगा।
Tuesday, 8 April 2014
लिखना ही तो चाहता हु
बस एक सपना है की मे भी लिखूँ क्या लिखना है इसके बारे मे अभी सोचा नहीं है। कागज पर लिखने मे आलस आता है इसलिए शायद लिखना एक सपना बन के रह गया। ब्लॉग मेरे जैसे नोसिखिये लेखको के लिए एक उपहार से कतई कम नहीं है। अपनी भावना व्यक्त करने का यह एक बढ़िया प्लैटफ़ार्म है। सही कहूँ तो मे अपने लेखन को हिन्दी पट्टी में कोई योगदान के रूप में कभी नहीं देखना चाहता फिर क्यो लिखना चाहता हूँ तो कहूँगा की तुलसीदास की कोई पंक्ति ने बहुत प्रभावित किया है। तुलसी दास के स्वान्त-सुखाय के सिद्धांत से मे सरोकार रखता हूँ।बचपन से लेकर आज तक न जाने कितनी कवितायें मेने लिखी और फाड़ के फेंक दी क्यो की कुछ समय के बाद खुद की कवितायें अप्रासंगिक लगने लगती थी। ब्लॉग लिखने से कुछ लिख जाने की भूख शायद समाप्त हो जाए ओर फाड़ फेंकने की नौबत भी शायद न आए
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इश्क और उसके बाद
कुछ भी लिखना बहुत कठिन है उंगलियों में गुदगुदी होने लगती है लेकिन एक शब्द या एक वाक्य के बाद उतना ही सहज और सरल भी । एक ही वक्त में एक ही इ...
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