क्या है जो कहने से शेष रह गया है ऐसा कुछ नहीं जो नए सिरे से कहना है l अब जो भी कहा जाएगा वह पूर्व मे कहे गए कुछ कि नकल मात्र होगी l मतलब यह कि अब हम एक नकली दुनिया का हिस्सा है या फिर किसी पूर्व मे कही गयी किसी कहानी को फिर से इस दुनिया के मंच पर मंचित कर रहे हैं l हम सब जानते हैं और सबकुछ जानते है फिर भी सब अंजान हैं l वर्तमान दुनिया मे मौजूद कोई साढ़े सात अरब में से आज से सौ साल बाद यहाँ क्या कोई होगाl तो सोचिए कि साढ़े सात अरब लोग मरने वाले हैं और ये तय है फिर भी हम रँग, नाम, और जाने क्या क्या को लेकर लड़ रहे हैं सही बात तो यह है कि दुनिया पागलखाना है हम सबको ठीक होते ही निज धाम लौट जाना है l
Monday, 25 December 2017
Wednesday, 26 July 2017
पुनरागमन
में लिखना तो चाहता हूँ I हाथ है कि साथ नहीं देते I यह ब्लॉग बनाये लगभग 3-4 साल हुए लेकिन ब्लॉग बनाया मन नहीं बना पाया जब पता हो कि पढ़ने वाला कोई नहीं हो तो लिखने का आनंद ही अलग होता है I मुझे आज कोई नहीं जानता तो मेरे लिखने मे दुनियादारी नहीं है I जिस दिन पता चलेगा कि मेरे कुछ पाठक है तो शायद मेरा लेखन व्यावसायिक हो जाए इसीलिए मेने मन होने के बावजूद लिखने का साहस नहीं किया I जाने कितनी कथा कहानी कविताये लिखकर मेने उनका अस्तित्व मिटा दिया I ख़ुद के लिए लिखने का सुख खोना नहीं चाहता इसको खोकर जो पाना होता है वो तो खोना ही है I (स्वांत सुखाय )
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इश्क और उसके बाद
कुछ भी लिखना बहुत कठिन है उंगलियों में गुदगुदी होने लगती है लेकिन एक शब्द या एक वाक्य के बाद उतना ही सहज और सरल भी । एक ही वक्त में एक ही इ...
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बचपन मे जब भी प्रेमचंद की ईदगाह पढ़ता था तो इसे अपने यहाँ होने वाले गणगौर के साँचे में फिट करके देखता था। हालांकि हमारे मेले मे मैंने मिट्टी...
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बस एक सपना है की मे भी लिखूँ क्या लिखना है इसके बारे मे अभी सोचा नहीं है। कागज पर लिखने मे आलस आता है इसलिए शायद लिखना एक सपना बन के रह गया...