Tuesday, 8 April 2014

लिखना ही तो चाहता हु

बस एक सपना है की मे भी लिखूँ क्या लिखना है इसके बारे मे अभी सोचा नहीं है। कागज पर लिखने मे आलस आता है इसलिए शायद लिखना एक सपना बन के रह गया। ब्लॉग मेरे जैसे नोसिखिये लेखको के लिए एक उपहार से कतई कम नहीं है। अपनी भावना व्यक्त करने का यह एक बढ़िया प्लैटफ़ार्म है। सही कहूँ तो मे अपने लेखन को हिन्दी पट्टी में कोई योगदान के रूप में कभी नहीं देखना चाहता फिर क्यो लिखना चाहता हूँ तो कहूँगा की तुलसीदास की कोई पंक्ति ने बहुत प्रभावित किया है। तुलसी दास के स्वान्त-सुखाय के सिद्धांत से मे सरोकार रखता हूँ।बचपन से लेकर आज तक न जाने कितनी कवितायें मेने लिखी और फाड़ के फेंक दी क्यो की कुछ समय के बाद खुद की कवितायें अप्रासंगिक लगने लगती थी। ब्लॉग लिखने से कुछ लिख जाने की भूख शायद समाप्त हो जाए  ओर फाड़ फेंकने की नौबत भी शायद न आए 

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