कहते हैं की धरती पहले आग का गोला थी अब इसकी सतह ठंडी हो गयी है अन्दर फिर भी आग भरी है इतनी आग की पत्थर पिघल जाये और उपर एक आग का गोला और है सुबह से शाम तक किसी सरकारी बाबु की तरह आता है और लौट जाता है। यहाँ हम इंसान तमाम विकसित सभ्यताओ से विकसित होने का दावा करते है लेकिन ये किसको पता है की यही दावा कोई चींटी नहीं करती उसकी भाषा कौन जनता है सभी जीवित प्राणी यही सोचते होंगे सबको अपने होने का गुरुर है सब किसी भी तरह अपने उसी रूप में जीना चाहते है।सोचिये की एक चींटी का क्या सपना होगा की बड़े होकर उसको क्या बनना है वो बिना रुके थके इतनी मेहनत क्यों कर रही है उसको किस उम्मीद ने जिन्दा रखा है हौसला दिया है इतना कुछ करने का या फिर दीवार पर घुमती छिपकली को देखिये उसके बच्चे का क्या सपना है की बड़ा होकर वो जादा से जादा कीड़े खायेगा और खायेगा भी तो वो क्या बन जायेगा तमाम प्राणियों के बारे में सोचिये वे सब क्यों चलते जा रहे है एक अंजान मंजिल की और अंत में सबको धरती का गुरुत्व अपनी और खींच लेगा और सब मिटटी में मिल जायेंगे।हम सब गुरुत्व से लड़ रहे है खड़े रहने के लिए एक दिन थक कर सो जायेंगे यहाँ कोई कुछ नहीं बनेगा सब मिटटी बन जायेंगे। यह जिन्दगी एक सपना है दुनिया नकली है सपना खुलने पर पता चलेगा की हमारा मूल स्वरूप क्या है।
Thursday, 21 June 2018
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
इश्क और उसके बाद
कुछ भी लिखना बहुत कठिन है उंगलियों में गुदगुदी होने लगती है लेकिन एक शब्द या एक वाक्य के बाद उतना ही सहज और सरल भी । एक ही वक्त में एक ही इ...
-
कुछ भी लिखना बहुत कठिन है उंगलियों में गुदगुदी होने लगती है लेकिन एक शब्द या एक वाक्य के बाद उतना ही सहज और सरल भी । एक ही वक्त में एक ही इ...
-
बचपन मे जब भी प्रेमचंद की ईदगाह पढ़ता था तो इसे अपने यहाँ होने वाले गणगौर के साँचे में फिट करके देखता था। हालांकि हमारे मेले मे मैंने मिट्टी...
-
बस एक सपना है की मे भी लिखूँ क्या लिखना है इसके बारे मे अभी सोचा नहीं है। कागज पर लिखने मे आलस आता है इसलिए शायद लिखना एक सपना बन के रह गया...
No comments:
Post a Comment