Thursday, 21 June 2018

सपना

कहते हैं की धरती पहले आग का गोला थी अब इसकी सतह ठंडी हो गयी है अन्दर फिर भी आग भरी है इतनी आग की पत्थर पिघल जाये और उपर एक आग का गोला और है सुबह से शाम तक किसी सरकारी बाबु की तरह आता है और लौट जाता है। यहाँ हम इंसान तमाम विकसित सभ्यताओ से विकसित होने का दावा करते है लेकिन ये किसको पता है की यही दावा कोई चींटी नहीं करती उसकी भाषा कौन जनता है सभी जीवित प्राणी यही सोचते होंगे सबको अपने होने का गुरुर है सब किसी भी तरह अपने उसी रूप में जीना चाहते है।सोचिये की एक चींटी का क्या सपना होगा की बड़े होकर उसको क्या बनना है वो बिना रुके थके इतनी मेहनत क्यों कर रही है उसको किस उम्मीद ने जिन्दा रखा है हौसला दिया है इतना कुछ करने का या फिर दीवार पर घुमती छिपकली को देखिये उसके बच्चे का क्या सपना है की बड़ा होकर वो जादा से जादा कीड़े खायेगा और खायेगा भी तो वो क्या बन जायेगा तमाम प्राणियों के बारे में सोचिये वे सब क्यों चलते जा रहे है एक अंजान मंजिल की और अंत में सबको धरती का गुरुत्व अपनी और खींच लेगा और सब मिटटी में मिल जायेंगे।हम सब गुरुत्व से लड़ रहे है खड़े रहने के लिए एक दिन थक कर सो जायेंगे यहाँ कोई कुछ नहीं बनेगा सब मिटटी बन जायेंगेयह जिन्दगी एक सपना है दुनिया नकली है सपना खुलने पर पता चलेगा की हमारा मूल स्वरूप क्या है

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