Wednesday, 26 July 2017

पुनरागमन

में लिखना तो चाहता हूँ I हाथ है कि साथ नहीं देते I यह ब्लॉग बनाये लगभग 3-4 साल हुए लेकिन ब्लॉग बनाया मन नहीं बना पाया जब पता हो कि पढ़ने वाला कोई नहीं हो तो लिखने का आनंद ही अलग होता है I मुझे आज कोई नहीं जानता तो मेरे लिखने मे दुनियादारी नहीं है  I जिस दिन पता चलेगा कि मेरे कुछ पाठक है तो शायद मेरा लेखन व्यावसायिक हो जाए इसीलिए मेने मन होने के बावजूद लिखने का साहस नहीं किया  I जाने कितनी कथा कहानी कविताये लिखकर मेने उनका अस्तित्व मिटा दिया  I ख़ुद के लिए लिखने का सुख खोना नहीं चाहता इसको खोकर जो पाना होता है वो तो खोना ही है  I (स्वांत सुखाय ) 

इश्क और उसके बाद

कुछ भी लिखना बहुत कठिन है उंगलियों में गुदगुदी होने लगती है लेकिन एक शब्द या एक वाक्य के बाद उतना ही सहज और सरल भी । एक ही वक्त में एक ही इ...