में लिखना तो चाहता हूँ I हाथ है कि साथ नहीं देते I यह ब्लॉग बनाये लगभग 3-4 साल हुए लेकिन ब्लॉग बनाया मन नहीं बना पाया जब पता हो कि पढ़ने वाला कोई नहीं हो तो लिखने का आनंद ही अलग होता है I मुझे आज कोई नहीं जानता तो मेरे लिखने मे दुनियादारी नहीं है I जिस दिन पता चलेगा कि मेरे कुछ पाठक है तो शायद मेरा लेखन व्यावसायिक हो जाए इसीलिए मेने मन होने के बावजूद लिखने का साहस नहीं किया I जाने कितनी कथा कहानी कविताये लिखकर मेने उनका अस्तित्व मिटा दिया I ख़ुद के लिए लिखने का सुख खोना नहीं चाहता इसको खोकर जो पाना होता है वो तो खोना ही है I (स्वांत सुखाय )
Wednesday, 26 July 2017
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इश्क और उसके बाद
कुछ भी लिखना बहुत कठिन है उंगलियों में गुदगुदी होने लगती है लेकिन एक शब्द या एक वाक्य के बाद उतना ही सहज और सरल भी । एक ही वक्त में एक ही इ...
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बचपन मे जब भी प्रेमचंद की ईदगाह पढ़ता था तो इसे अपने यहाँ होने वाले गणगौर के साँचे में फिट करके देखता था। हालांकि हमारे मेले मे मैंने मिट्टी...
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